सोवियत संघ पर हमले की एक कहानी – Soviet Union Hindi Story

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सोवियत संघ पर हमले की एक कहानी – Soviet Union Hindi Story

फैसला हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी हो रहा है वह सब हमारे द्वारा किए गए फैसलों का ही नतीजा है। लोगों को यह एहसास होने में या तो बहुत देर हो जाती है या फिर पूरी जिंदगी ही निकल जाती है लेकिन वह यह नहीं जान पाते कि जो कुछ भी उनके आसपास हो रहा है, वह कहीं ना कहीं उन्हीं के द्वारा किए गए फैसलों का नतीजा है लेकिन वह बड़ी आसानी से दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं और सोचते हैं की दोष दूसरों पर मढ़ देने से वह छुटकारा पा लेंगे। यह कहानी इसी मनोदशा को ठीक करने के बारे में है कि कैसे एक लड़का जो कि परिवार में सबसे छोटा है अपनी बुद्धि से परिवार पर आने वाली समस्याओं को बड़ी ही बहादुरी के साथ रोक लेता है।

पोलैंड की सीमा से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक रूसी गांव है जिसका नाम ’स्लावोस्कोए’ है। मई,1940 के शुरुआत के आसपास एक लड़का जिसका नाम ’मिरोस्लाव’ होता है इसी गांव से संबंध रखता है और रूस के एक शहर ’कोनास’ के एक स्कूल में जिसका नाम ’कोनास जेसुइत जिमेंनेजियम सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ है जो कि उस गांव से लगभग ’ढाई सौ’ किलोमीटर’ की दूरी पर होता है में ’हाईस्कूल की पढ़ाई’ कर रहा होता है। मिरोस्लाव के पिता एक छोटे किसान होते हैं। मिरोस्लाव की उससे बड़ी उसकी दो बहनें होती है। मिरोस्लव की मां ही उसको पढ़ने के लिए उसके गांव से सौ किलोमीटर दूर एक शहर ’कोनास’ में भेज देती है कोनास में मिरोस्लाव बचपन से ही पढ़ाई करता है उसकी मां का एक ही सपना होता है कि वह जब बड़ा हो तो अपने देश का नाम रौशन करें और परिवार को आर्थिक समस्याओं से निजात दिला सके तथा अपने गांव की तरक्की कर सके जिस गांव में उनका परिवार सब रहते हैं। उसकी मां की इस सोच का कारण गांव के बदतर हालत थे।

उसके पूरे परिवार ने हमेशा गरीबी का सामना किया था और पिता खेती-बाड़ी करके किसी तरीके से अपने परिवार का जीवन निर्वहन करते थे। उनके गांव में संसाधनों की काफी कमी थी, इसी वजह से खेती भी उस तरह की नहीं हो पाती थी जिस तरीके की खेती उस गांव में आशान्वित थी। उसके परिवार के अलावा उस गांव में मात्र बीस परिवार ही रहते थे, जो उस गांव को छोड़कर कहीं और बसना चाहते थे लेकिन यह कर पाना किसी भी परिवार के लिए बहुत ही मुश्किल था क्योंकि पहले जितने भी परिवार उस गांव को छोड़ने की कोशिश कर चुके थे या तो वह पूरी तरीके से कर्जे में डूब जाते थे या वह उससे भी बुरी हालत में आ जाते थे, उस गांव से पलायन करना और किसी दूसरे स्थान पर जाकर नई शुरुआत करना इसलिए मुश्किल हो जाता था क्योंकि बड़े शहर उस गांव से बहुत दूरी पर थे। उस गांव के परिवार के लोगों को रूस के बहुत बड़े भौगोलिक देश होने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा था जो कि उस गांव को देश के मुख्य शहरों से दूर कर देता था।

’मिरोस्लाव’ को यह बात बचपन से ही परेशान करती थी। अपनी मां के करीब होने के कारण ’मिरोस्लाव’ हमेशा अपनी मां की चाहत को पूरा करना चाहता था। इसीलिए वह पढ़ाई में भी पूरा मन लगाता था और अपनी पढ़ाई बहुत ध्यान लगाकर करता था। उसकी मां उसे बहुत प्यार करती थी लेकिन उसके पिता चाहते थे कि वह अब बड़ा हो गया है तो खेती किसानी में उनका साथ दे लेकिन ’मिरोस्लाव’ की मां उसे शिक्षित करा कर एक बड़ा आदमी बनते हुए देखना चाहती थी।
एक दिन ’मिरोस्लाव’ अपनी हाई स्कूल की परीक्षा के पहले अपने घर आया हुआ था और दो दिन गुजर जाने के बाद अपने परिवार से बताता है कि उसे उसके अध्यापक ने बताया है जो कि इतिहास पढ़ाते हैं कि आजकल ’जर्मनी’ ने बहुत ही आक्रामक रुख अपना रखा है और वह कभी भी हमारे देश पर खतरनाक हमला कर सकता है।

जर्मनी ने पहले ही कई देशों पर हमला कर उन देशों पर कब्जा कर रखा है, हो सकता है कि अब हमारी बारी आ जाए इसलिए उन्होंने मुझसे कहा है कि तुम अपने परिवार को और गांव वालों को यह बात बताओ क्योंकि कभी भी जर्मनी की सेना हम सबकी ओर बढ़ सकती है, तुम्हारा गांव पहले दुश्मन सेना के रास्ते में आयेगा और इस समय हमारे देश की सेना उनके देश की सेना जितनी मजबूत भी नहीं है जो उनसे मुकाबला कर सके और उनको बेहतर तरीके से टक्कर दे सके। हमारे राष्ट्रवादी नेता ’स्टालिन’ भी इस बात पर भरोसा नहीं कर रहे हैं कि जर्मनी उन पर हमला कर सकता है। मिरोस्लाव अपने सभी परिवार के सदस्यों को कहता है कि मेरे अध्यापक को पूरा अंदेशा है कि जल्द ही हमारे देश पर एक ऐसा आक्रमण होने वाला है इसलिए जितना जल्दी हो सके हमें गांव के बाकी परिवारों को यह बताना चाहिए और इस गांव को तुरंत खाली करवा कर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाना चहिए।

अभी यह सब करने का समय भी है नहीं तो हम सब उनकी सेना के द्वारा या तो मार दिए जाएंगे या इससे भी बुरा सलूक वो हमारे साथ करेंगे। यह बात सुनकर उसके पिता ’मिरोस्लाव’ को डांटते लगते हैं और उसे फालतू बात छोड़ कर काम में हाथ बंटाने के लिए कहते हैं उसके पिता उसकी इस बात से काफी नाराज हो जाते है और उसे कहते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है, तुम्हारे अध्यापक सिर्फ और सिर्फ एक अनुमान लगा रहें है इससे ज्यादा और कुछ नहीं। उन्हें किसी भी बात की जानकारी सही से नहीं है, स्कूल वाले तुम्हे ऐसा कहने को क्यों कह रहे हैं क्या उनके पास इसके अलावा और दूसरा कोई काम नहीं है। मिरोस्लाव पिता की डांट सुनकर कमरे से बाहर घर के आंगन में चला जाता है। थोड़ी देर बाद उसकी मां उसके पास आती है और उसे पिता की डांट का बुरा ना मानने के लिए कहती है।

फिर उसकी एक बड़ी बहन जो उससे केवल दो साल ही बड़ी होती है, वह भी उसके पास आ जाती है और बाहर आंगन में मां और उसकी बहन दोनों उससे उसके अध्यापक के बारे में पूछने लगते हैं, उन दोनों के ही माथे पर चिंता की लकीरें होती है और ’मिरोस्लाव’ से पूछते हैं अगर कहीं हकीकत में ऐसा हो गया तो हम लोग क्या कर पाएंगे। तो मिरोस्लाव मां और बहन से कहता है कि पिताजी यह बात भले ही ना समझे लेकिन कुछ भी हो जाए हमें पहले से ही दुश्मनों से बचने के लिए तैयार रहना पड़ेगा ताकि उनके आने पर हम उन्हें यहां पर न मिलें। तभी ’मिरोस्लाव’ की बड़ी बहन भी वहां आ जाती है और उससे पूछती है, ये बात कितनी पक्की है क्या तुम्हे अपने अध्यापक पर पूरा भरोसा है जो वो कह रहे है क्या सच में हो सकता है तुम्हें उनपर इतना विश्वास कैसे है अगर ये बात सही भी है तो हम सबका यहां से निकल कर कहीं और जा पाना बहुत ही कठिन है।

ये लगभग नामुमकिन है। ’मिरोस्लाव’ जवाब में कहता है ’दीदी’ मुझे मेरे टीचर पर इसलिए पूरा भरोसा है कि उन्हें इस समय के हालातों की बेहतर जानकारी है। वह हिस्ट्री पढ़ाते है और काफी वृद्ध भी है और उनका अनुभव है, उन्होंने मुझे पूरे विश्वास के साथ ये बात बताई है। जब वो मुझे ये बात कह रहे थे तब उनके अंदर इस बात को लेकर कोई भी शंका नहीं नजर आ रही थी। उन्होंने मुझे इसके कुछ कारण भी बताए है, इस समय वह हमें कई दिनों से इस समय के हालातों के बारे में लगातार बतांते आ रहे हैं, जैसे उन्हें पता है कि हमला आज नहीं तो कल होना ही है, अब आप बताइए दीदी मैं कैसे उनकी बातो को काट दूं वह मेरे मार्ग दर्शक हैं वह इस समय के हालातों की बेहतर समझ रखते हैं।

और कुछ घटनाओं ने उनको जो इशारा दिया है वह इसी बात की ओर है कि ’हिटलर’ अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और उसका सबसे बड़ा ’लक्ष्य’ इस समय सोवियत संघ होने वाला है, उसकी सेना काफी मजबूत है और जिस तरीके से अभी तक उसकी सेना ने जिन भी देशों पर चढ़ाई की है वहां वह देश जीत चुका है यहां तक ’ब्रिटेन’ भी काफी नुकसान झेल चुका है, वो बात अलग है कि वह चारो और से समुद्र से घिरा हुआ है इसीलिए ब्रिटेन में पैदल सेना का जाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है वरना ’हिटलर’ ब्रिटेन पर भी अब तक चढ़ाई कर चुका होता। मुझे भी इस बात पर पूरा विश्वास है और ये जल्द ही होने भी वाला है अगर आप सबने इस बात पर विश्वास न किया तो आने वाला कल हम सब के लिए अच्छा नहीं होने वाला है।

इसलिए मैं आप सबको यही कहूंगा कि हमें अपनी सेना से पहले ही बात कर लेनी चाहिए। मेरे हॉस्टल के पास एक अंकल पहले सेना में काम करते थे। मैने उन्हे अपना दोस्त बनाया है और मैने उनसे भी इस मुद्दे पर बात करी है। वह काफी सुलझे हुए इंसान हैं और मुझे बहुत सारी बाते बता चुके है, उन्होंने मुझे कहा है कि मेरा बेटा फौज में है और इस समय छुट्टियों पर आने वाला है तुम चाहो तो उसे ये बात बताकर अपने गांव की सुरक्षा के लिए अभी से सारी तैयारियां शुरू कर सकते हो। मेरा बेटा भी तुम्हारी बात से पूरी तरीके से सहमत होगा क्योंकि वह भी मेरे से इस विषय पर बात कर चुका है। मिरोस्लाव यह बात कहकर बाकी सारे परिवार को केवल अपने पिता के अलावा अपनी इस बात से सहमत कर लेता है। तभी मिरोस्लाव की मां कहती है बेटा तुम शायद सही कह रहे हो मैं तुम्हारे पिता को समझाऊंगी। तुम कोनास की और निकलो और अपने उस अंकल के बेटे से मिलो ताकि हम अपने गांव को बचाने के लिए अभी से कुछ कर सकें। मैं तुम्हारे साथ हूं और ये बहने भी तुम्हारा साथ देगी तुम्हारी बातों पर मुझे पूरा विश्वास है।

हम यहां पर और लोगो को तब तक ये बात समझाते हैं और उन्हें अपने समर्थन में लेते है ताकि हम पूरा गांव मिलकर हम सभी अपना बचाव कर सकें। हम सब तुम्हारे साथ हैं बस तुम वहा जाकर उस सिपाही से यह पूछो कि हम सबको अभी अपने बचाव के लिए क्या कदम उठाने चाहिएं। इसी के बाद मिरोस्लाव अगले दिन अपने स्कूल के लिए रवाना हो जाता है और वह अपने स्कूल के हॉस्टल में पहुंचकर सीधे उन अंकल से मिलता है जो सेना में खुद भी काम कर चुके है और उनका बेटा भी इस समय सेना में ’प्राइवेट’ रैंक पर अभी अभी भर्ती हुआ है। भाग्य से उनका बेटा भी उसे वहां पर पहली बार में मिल जाता है। फिर मिरोस्लाव अपने गांव के बचाने के बारे में उन्ही परिचित अंकल के बेटे से जिसका नाम ’जोसफ’ होता है से बात करता है। जोसफ उसे कहता है मैं तुम्हारी और तुम्हारे घरवालों की मदद करूंगा।

मेरे एक अफसर है उन्हे अच्छे से पता है कि सुरक्षा के लिए जमीन के अंदर गुप्त तरीके से कैसे एक सुरक्षित स्थान बनाया जाता हैं इस काम को करने के लिए सेना के पास एक मशीन भी है लेकिन इसके काम के बदले तुम्हे सेना की मदद करनी होगी हम तुम्हारे लिए ये काम कर देंगे और समय रहते कर देंगे बस तुम्हे जब जर्मनी की सेना तुम्हारे गांव पर कब्जा करे तो तुम्हे हमें टेलीफोन पर जो कि हम उसी गुप्त स्थान पर रखेंगे तुम्हे उस फोन के माध्यम से वहां के जमीनी हालातों के बारे में रोज खबर देनी होगी हो सकता है दिन में दो बार। इस काम में तुम्हारी जान का खतरा भी होगा क्या तुम्हे ये मंजूर है तुम्हारे गांव की मदद करने के लिए सेना तैयार है। तो मिरोस्लाव बिना सोचे समझे उन्हे हां कर देता है और कहता है, मैं मर भी जाओ तो क्या मेरे गांव तो बच सकता है अगर सबको बचाने के लिए मुझे मरना भी पड़े तो मेरी मौत भी सबके काम आ सकती है।

ये बात एक सोलह साल के लड़के के मुंह से सुनकर जोसेफ और उसके पिता मार्कस हतप्रद रह जाते है और उन्हें उस लड़के पर बहुत फर्क होता है। जोसफ उसे बताता है कि हमारी कंपनी के कैप्टन कुछ खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए कुछ नागरिकों को जिम्मेदारी देना चाहते है और उसके लिए उन्होंने हम सभी कंपनी के सिपाहियों को इसे पूरा करने के लिए कहा हुआ है। तुम्हे इसके लिए कोई आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी क्योंकि उन्होंने जरूरतमंदों को ही इस अभियान में शामिल होने के लिए हमें कहा है। मैं अपने अफसर से टेलीफोन पर बात करके अभी के अभी तुम्हें तुम्हारे गांव के लिए कुछ मदद भिजवाता हूं। तुम अपने परिवार वालों को यह जानकारी टेलीफोन के माध्यम से दे दो और थोड़ी देर बाद मेरे साथ चलो जब मैं तुम्हे लेने के लिए आऊं जिसके बाद मैं तुम्हे अपनी सेना के कामकाज से रूबरू कराता हूं।

मिरोस्लाव तुरंत ही अपने हॉस्टल जाता है और उसके बाद जोसफ उसे वहा से लेकर वहां ले जाता है जहां उसके कंपनी के कैप्टन उनका इंतजार कर रहे होते हैं वो उनसे मिरोस्लाव की मुलाकात करवाता है और वो कैप्टन मिरोस्लाव को कैसे उसे अपना काम करना है इसके बारे में जानकारी देते हैं। उसके बाद मिरोस्लाव वापस अपने घर चला आता है और साथ में उसके सेना के दो जवान भी कैप्टन उसके साथ भेजते हैं एक जवान जोसफ होता है और दूसरा एक और सिपाही पेत्रोव साथ में जाता है। दोनो जवान मिरोस्लाव के घर जाते है और पूरे गांव वालों को एकत्रित करके उन्हें बताते है कि इस जगह पर सेना आप सबकी सुरक्षा के लिए जमीन से कई फूट नीचे आपके लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनाने वाली है। गांव वाले भी तब तक तैयार होते हैं ये बात सुनने के लिए और सभी गांव वाले सेना के साथ देने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं ऐसा इसलिए आसानी से हो पाता है क्योंकि मिरोस्लाव की मां और बहनें इसमें उसकी मदद करती हैं,

गांव वालों को पहले से ही पता होता है और उन्हें भी इस बात का डर होता हैं कि हमारे साथ बर्बरता न की जाए इसलिए वह सभी पूरी तरीके से सेना के समर्थन में आ जाते है और जमीन के नीच गुप्त तरीके से रहने के लिए एकसाथ हो जाते है। यही एकजुटता जो मिरोस्लाव की वजह से गांव वासियों में दिखाई पड़ती है उसी के कारण ऐसा कर पाना अब संभव दिखाई देने लगता है मिरोस्लाव की ये कोशिश अब रंग लाने लगती है और वह सेना के उस कैप्टन से एक बार फिर मिलने की कोशिश करता है। लेकिन कैप्टन उसे ये बंकर बन जाने के बाद मिलने के लिए बुलाते हैं तब तक मिरोस्लाव का प्रक्षिशण चालू हो जाता है, विशेष रूप से कैप्टन की सिफारिश के द्वारा और उस प्रशिक्षण के द्वारा मिरोस्लाव को एक गुप्तचर की तरह काम करने की हर वो तकनीक सिखाई जाती है जो एक अच्छे गुप्तचर के लिए जरूरी होती है।

धीर-धीरे कुछ दिनों में कुछ बाधाओं के बाद मिरोस्लाव अपने इस प्रशिक्षण के माध्यम से कुछ हद तक एक प्रशिक्षण प्राप्त गुप्तचर के रूप में परिवर्तित हो जाता है। उधर सेना गांव के लोगो की मदद से एक बेहतर रहने योग्य गुप्त स्थान निर्मित कर देती है। जहां पर खाद्य सामग्री भी लगभग एक साल के लिए पूरी तरह से संग्रहित कर दी जाती है जिसे इन गांव वासियों के बीस परिवारों को जिसमे मिरोस्लाव का परिवार भी शामिल होता है, को पूरे दो साल से ढाई साल तक उपयोग में लाने के लिए निर्देश दिए जाते हैं। बीमारी की अवस्था के लिए कुछ दवाइयां और फर्स्ट एड बॉक्स भी उसी गुप्त स्थान पर स्थापित कर दिए जाते है। सेना और लोगो की मदद से एक पूरी जमीन के नीचे सुनियोजित तरीके से रहने और खाने की व्यवस्था एक पक्के बंकर के तौर पर कर दी जाती है जिसका संचालन करने की जिम्मेदारी मिरोस्लाव के पिता और गांव के दूसरे परिवारों के और दो सदस्यों को मिलती है।

तीन लोग इस तरह से ढाई साल तक जमीन के नीचे रहने वाले अपने ही गांव के लोगो की बेहतर तरीके से देखभाल करने की जिम्मेदारी उठा लेते हैं। जिंदा बचे रहने की इस जगदोजहद में मिरोस्लाव और उसका परिवार पूरी तरह से जुट जाता है और साथ ही साथ अपने गांव के लोगो के लिए भी साथ मिलकर बचने की कोशिश में लग जाता है। पूरे दो महीने बीत जाते है और सभी गांव के लोग और मिरोस्लाव इस विपदा से लड़ने के लिए सेना की मदद से सारी तैयारियां पूरी कर लेते है फिर सेना के सभी दोनो सिपाही उस गांव से विदा ले लेते है और अपने सेना की टुकड़ियों में फिर से शामिल हो जाते हैं। मिरोस्लाव बहुत खुश होता है और पूरी मुस्तैदी के साथ लड़ने के लिए जर्मनी की सेना का इंतजार करने लगता है। थोड़े ही दिन गुजर जाने के बाद मिरोस्लाव को खबर मिलती है कि जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया है, जैसे ही यह सूचना मिरोस्लाव को मिलती है वह तुरंत ही गांव वालो को सचेत कर देता है।

और वह पूरी तरह से जर्मनी के उसके गांव तक पहुंच जाने के दिन पहले इंतजार करने लगता है, और पूरी सतर्कता के साथ इंतजार करता है। उसका गांव पोलैंड की सीमा से मात्र डेढ़ सौ किलामीटर की दूरी पर होता है और उसे सूचना मिलती है कि जर्मनी ने सोवियत संघ की फौज को पोलैंड से खदेड़ दिया है। जर्मनी की फौज की ’ब्लिट्जक्रीग’ रणनीति जो युद्ध में दुश्मन देशों पर आक्रमण करने के लिए इजाद की गई होती है, उसके बारे में मिरोस्लाव को पहली बार पता चलता है। इस रणनीति के बारे में उसे जोसफ जो उसके अंकल मार्कस का लड़का होता है, जो सोवियत सेना में एक प्राइवेट रैंक पर है उसे जानकारी देता है कि जर्मनी की सेना इस रणनीति के कारण बहुत तेजी से हर रोज पचास किलोमीटर की दूरी तय करती जा रही है। और वो तीन से चार दिनों में तुम्हारे गांव तक पहुंच जाएगी।

मिरोस्लाव को ये पता लगते ही वह तुरंत अपने पिता को ये बात बताता है और उसके पिता और उनके साथ शामिल बाकी सभी की जिम्मेदारी जिनके सर पर थी उन्हे भी इस बारे में उसके पिता बताते हैं, वह सब गांव वासियों को नीचे बंकर में जाने के लिए तैयार रहने के लिए कहते है। सब लोग काफी डरे हुए होतें है, और धीरे धीरे बंकर के अंदर जो कि जमीन से पचास फिट नीचे से शुरू होता है जाने की तैयारी शुरू कर देते है। उसके अगले दिन तक सभी गांव के लोग पूरी तरह से अपने गांव की जमीन को खाली करके जमीन के नीचे उसी बनकर में चले जाते हैं। और पूरी तरह से गुप्त रूप से पूरे के पूरे बीस परिवार अपने जीवन की सुरक्षा के लिए कमर कस लेते हैं। मिरोस्लाव को एक विशेष रूप से सेना के द्वारा उस बंकर के सतह के प्रवेश द्वार से दुश्मन सेना की निगरानी करने के लिए और टेलीफोन के द्वारा सोवियत सेना को सही जानकारी देने के लिए निर्देश दिया जाता है।

मिरोस्लाव अपनी पूरी ईमानदारी के साथ इस काम को करने के लिए बंकर में सब जनों के चले जाने के बाद उस बंकर की एक हिस्से से अपने गांव की निगरानी करता है उसके पास एक दूरबीन भी उसे दी जाती है जिसकी मदद से वहा लगातार उस दिशा की ओर नजरे गड़ाए रहता है जिस दिशा से जर्मनी की फौज के आने की आहट हो सकती है। वह लगातार दस घंटे तक इस निगरानी के कार्य को अंजाम देता है। उसके बाद थोड़ा आराम करने के दौरान एक दूसरा लड़का इस काम को अंजाम देने लगता है, जो उसी के गांव में मिरोस्लाव का ही एक दोस्त होता है। थोड़ी देर तक जब तक मिरोस्लाव अपनी थकान दूर करता है और फिर से अपने दोस्त को हटाकर निगरानी करने लग जाता है, पूरी रात निकल जाती है और कोई भी आहट अभी तक उसे जर्मनी की सेना की नहीं मिली होती है, अगले दिन की रात तक जर्मनी की फौज या अगले दिन की रात के बाद की सुबह तक जर्मनी की फौज का वहां तक आने का अंदेशा होता है फिर से उसी तरीके से वह निगरानी करने में डट जाता है।

17 जून,1940 की सुबह करीब नौ बजे जर्मनी की सेना के टैंको की आहट सुनाई देने लगती है और मिरोस्लाव जर्मनी की सेना को पहली बार अपनी खुली आंखों से देखता है,जिस जगह से वह ये सब देख रहा होता है वह जगह भी सोवियत सेना के द्वारा बहुत ही सुविधा अनुसार बनाई गई होती है जहां से कोई भी आसानी से सब देख सकता था बिना किसी की नजर में आए हुए, फिर मिरोस्लाव तुरंत टेलीफोन के माध्यम से अपनी सोवियत रूस की सेना को इस बारे में जानकारी मुहैया करा देता है, और लगतार उनकी संख्या और साजोसमान के बारे में बताता जाता है। सोवियत सेना को सटीक जानकारी वो देने लगता है, और खुद का भी ध्यान रखता है इस बात पर कहीं कोई जर्मनी का सैनिक उसे देख न लें। थोड़ी ही देर बाद जर्मनी की पूरी सेना उस गांव पर कब्जा कर लेती है, लेकिन जब जर्मनी की सेना को वहां कोई नहीं मिलता है तो जर्मनी की सेना ऐसा मान लेती है कि सभी गांव वाले डर के कारण वहां से जा चुके हैं।

पूरी मानवता के लिए खतरा बनी हिटलर की सेना उस गांव के घरों को जला देती है और वहां सब नष्ट कर देती है,और अपनी सेना के कई अफसरों और सिपाहियों को वहीं छोड़ देती है और कुछ ही दिनो में उस गांव को एक खतरनाक सैनिक अड्डे में परिवर्तित कर दिया जाता है। मिरोस्लाव लगातार ये सब देखता रहता है और अपने देश की सेना को इस बात की जानकारी लगातार देता रहता है। वह टेलीफोन रडार प्रूफ होता है जिसके कारण जर्मनी की सेना को इस बारे में कोई भनक तक नहीं लगती इस बात की कि जमीन के पचास फिट नीचे पूरे गांव के लोग छुप पड़े हैं और उनकी एक गुप्तचर द्वारा निगरानी तक की जा रही है। इसी तरह से मिरोस्लाव लगातार अपनी सेना को जानकारी देता रहता है, दिन गुजरते जाते है और वो और गांव के सभी लोग अपनी जान की रक्षा करने में सफल होने लगते हैं।

और लागतार ढाई साल तक इसी तरह से अपनी जिंदगी एक बड़े बंकर में कठिनता के साथ गुजारते हैं, जब तक सोवियत रूस की सेनाएं जर्मनी को वहां से खदेड़ कर उस गांव पर अपना कब्जा नहीं कर लेती। और अंत में पूरे का पूरा गांव बिना किसी इंसानी जिंदगी को गवाए जीवित बच निकलता है और सभी गांववासी और सेना मिरोस्लाव की इस तरह की बहादुरी और सूझबूझ पर बहुत गर्व करने लगते हैं। मिरोस्लाव द्वारा सोवियत सेनाओं को सटीक जानकारी देने के कारण सेना उसके गांव को विकसित करने में मदद करती है और उसे आगे की पढ़ाई करने लिए मास्को विश्वविद्यालय से स्कॉलरशिप दिलाती है।

तो इस प्रकार मिरोस्लाव अपने गांव की रक्षा करके अपनी मां के उस गांव को विकसित करने के सपने को भी संपूर्ण कर देता है और अपने परिवार पर पड़ने वाली मुश्किलों से बचाता है तथा आगे जाकर सेना में अफसर के तौर पर सोवियत रूस की सेना में पूरी तरह से शामिल हो जाता है। फिर अफसर रहते हुए सेना के कई अभियानों को सफल बनाता है और अपने गांव की भी विशेष रूप से देख भाल करता है तथा अपने गांव को संसाधनों से पूरी तरह से युक्त कर देता है। इस प्रकार ये कहानी एक बच्चे के एक ऐसे फैसले पर आधारित है जो कि उस गांव के लिए वरदान बन जाता है।

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Mohit Bhasin

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