सिगरेट का धुंआ – Poem On Smoking

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सिगरेट का धुंआ – Poem On Smoking

सिगरेट का धुंआ
छीन लेता है कहीं उठने
बैठने का हक
लोगो की बोलचाल में
आ जाता हैं फर्क
जिन नज़रों में हम कभी
होशियार थे
आज उन्हीं नज़रों में हम
बेकार है
सिगरेट का धुंआ
जीने की उम्मीद को भी
करता है कम
पीते फिर भी क्या इतने
पागल है हम
तो पल की बस मोज है
जिस की सजा हर रोज है
टेंशन थी या शौक का था
वो पहला दम
कैसा तो वो पल जिसमें
बिगड़े थे हम
सिगरेट का धुंआ

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Sudhanshu Krnwal

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